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" forced marriage"

राजस्थान

एक छोटा सा घर दुल्हन की तरह सजा हुआ था। जहाँ शादी में चहल-पहल होती है, वहीं इस शादी के घर में एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था।

किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि एक शब्द भी बोल दे। शादी के मंडप पर एक दुल्हन बैठी हुई थी जिसने घूंघट किया हुआ था। उस लड़की की पकड़ अपने लहंगे पर कस गई थी, लेकिन उसने एक शब्द भी नहीं कहा था।

आसपास खड़े लोग उस दुल्हन को देख रहे थे। किसी के होंठों पर मज़ाक वाली मुस्कुराहट थी तो कोई दुखी था। पंडित जी भी किनारे बैठे हुए थे और घबराए हुए थे। और कई लोग तो अपने हाथ में बंदूक लिए खड़े थे।

जो लोग बंदूक लिए थे उनके होंठों पर अजीब सी मुस्कुराहट थी।

एक बूढ़ा आदमी अपनी पगड़ी उतारकर अपने सामने खड़े आदमी के पैरों में रखते हुए गिड़गिड़ा कर बोला, "ऐसा मत करिए, मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। कौन करेगा मेरी बेटी से शादी? आप ही ने मेरी बेटी का हाथ मांगा था, लेकिन अब आप शादी से मुकर रहे हैं।" इतना कहते ही वह बूढ़ा आदमी अपने हाथ जोड़ लेता है।

उस बूढ़े आदमी के सामने एक 28 साल का आदमी खड़ा था जिसने शेरवानी पहनी थी, मगर उस आदमी के होंठों पर एक शैतानी मुस्कुराहट थी।

उस आदमी ने एक नज़र मंडप पर बैठी दुल्हन को देखा, फिर अपने पैरों के पास बैठे बूढ़े आदमी को देखते हुए हँस कर बोला, "पर अब मुझे शादी नहीं करनी है।"

अपनी बात खत्म करते ही वह आदमी हँसने लगता है। वह बूढ़ा आदमी रोते हुए बोला, "ऐसा मत करिए, मेरी बेटी कहाँ जाएगी? अगर यह शादी नहीं हुई तो लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें बनाएँगे। आपने कहा था आप मेरी बेटी को खुश रखेंगे।" यह सुनकर वह आदमी अपने हाथ को अपनी गर्दन पर करता है।

फिर अपने बगल में खड़े आदमी को देखते हुए अनजान बनकर बोला, "क्या मैंने ऐसा कहा था? मुझे याद क्यों नहीं आ रहा।"

उसके बगल में खड़े आदमी ने अपनी बंदूक को सहलाते हुए मुस्कुरा कर कहा, "अभिनव भैया, मुझे याद आया आपने ऐसा कहा था।"

अभिनव हँसते हुए बोला, "अरे मुझे भी याद आ गया! मैंने कहा था, पर अब मैं अपनी बात से मुकर रहा हूँ।" "लेकिन..." इतना कहते ही अभिनव अपने आसपास मौजूद सभी आदमियों को देखकर बोला, "यह शादी भले ही ना हो, मगर हम शादी का खाना खाकर जाएँगे। रही बात इस दुल्हन की..." इतना कहते ही अभिनव ऊपर से नीचे तक गंदी नज़रों से दुल्हन को देखा।

फिर उस दुल्हन के पिता को देखकर शैतानी मुस्कुराहट से बोले, "शादी तो नहीं होगी, लेकिन अगर आप चाहते हैं कि हम आपकी बेटी के साथ शादी के बाद वाली रस्म करें तो वह हम कर सकते हैं।"

अभिनव के बगल में खड़ा आदमी उसे चिढ़ाते हुए बोला, "अभिनव भैया, यह तो बेशर्मी है। लगता है आप बहुत तड़प रहे हैं उसके साथ सुहागरात मनाने के लिए, तो वैसे हमें भी भूल मत जाइएगा। आखिरकार हम आपके वफादार चेले हैं।"

उन सब की ऐसी बातें सुनकर दुल्हन के पिता बहुत ही बेबस थे। दुल्हन की माँ चुप बैठी हुई थी, मगर उनकी आँखों में भी आँसू थे। वह अभिनव और उसके लोगों से बहुत डरी हुई थी।

अभिनव और उसके लोग अभी भी हँस रहे थे। अभिनव ने अपने लोगों से कहा, "चाहे जो हो जाए, जब तक हम सब अपना पेट नहीं भर लेते, यह दुल्हन मंडप से नहीं उठेगी। फिर उसके बाद इसके मुँह पर कालिक पोत कर इसे कोठे पर छोड़ आओ।"

इस बार दुल्हन की माँ अभिनव के पैरों में गिर गई और रोते हुए बोली, "नहीं, मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद मत करिए। मेरी एक ही बेटी है।"

अभिनव हँसकर बोला, "मैं तो उसकी जिंदगी बना रहा हूँ। बहुत राज करेगी वहाँ पर, आपकी बेटी रानी बनकर रहेगी।"

दुल्हन के पिता को गुस्सा आ गया। उन्होंने गुस्से में कहा, "मैं मेरी बेटी के बारे में ऐसी घटिया बातें नहीं सुनूँगा।"

अभिनव शैतानी अंदाज़ में बोला, "इस बुड्ढे की बहुत ज़ुबान चल रही है। इसे बताओ मेरे सामने ऊँची आवाज़ में बात करने का क्या अंजाम होता है।"

अभिनव के आदमी दुल्हन के पिता को पकड़ लेते हैं और उसे पीटने लगते हैं।

दुल्हन की माँ रोते हुए अपने पति को पकड़ कर बोली, "नहीं, छोड़ दीजिए इन्हें।"

दुल्हन जो मंडप पर बैठी थी, वह भी जल्दी से उठ जाती है। उसने अभी भी घूँघट किया था।

वह अपने पिता के पास जाती है, उससे पहले ही अभिनव उसकी कलाई को पकड़कर हँसते हुए बोला, "अरे अरे अरे मेरी दुल्हन कहाँ जा रही है? सोच रहा हूँ सुहागरात मनाकर ही जाऊँ।"

पुलिस स्टेशन

वहीं दूसरी तरफ पुलिस स्टेशन के बाहर 5 जीपें खड़ी हुई थीं। कई सारे आदमी हाथों में फूलों की माला और गुलदस्ते लेकर खड़े थे। उनके हाथ में भी बंदूक थी और वह सब बहुत खुश थे।

उन सभी ने पैंट और शर्ट पहना था और उसके ऊपर लेदर की जैकेट।

पुलिस स्टेशन के अंदर एक आदमी मौजूद था जिसने जेल वाले कपड़े पहने थे जो सफ़ेद कलर के थे। उसकी काली आँखें चमक रही थीं, पर उन आँखों में कई सारे रहस्य छिपे हुए थे।

उसके होंठों पर चिढ़ाने वाली मुस्कुराहट थी। उसके बाल बिखरे हुए थे। वह बहुत हैंडसम लग रहा था। उसके देखने का नज़रिया बहुत ही चुलबुला था।

उस आदमी की उम्र का अंदाज़ा लगाना थोड़ा मुश्किल था।

उस आदमी को बाहर जाते हुए देखकर इंस्पेक्टर ने अपने सर को हिलाते हुए कहा, "पता नहीं ऐसे बिगड़ैल लड़कों का क्या होगा? बाप के दम पर ये कुछ भी करते हैं।"

बगल में खड़े हवलदार ने कहा, "साहब, ऐसा मत कहिए वरना आपके लिए दिक्कत हो जाएगी। आपको पता नहीं है, यह हमारे सीएम का बेटा है। घर में सबसे छोटा है, इसीलिए हर कोई इसकी हर ख्वाहिश पूरी करता है। इसलिए यह बहुत बिगड़ गया है। इसका भाई बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। अच्छा हुआ हमने इस पर हाथ उठाने की कोशिश नहीं की। अगर इसे एक खरोंच भी आ जाती तो यह पुलिस स्टेशन नहीं बचता।"

इंस्पेक्टर थोड़ा सा हैरान हुए मगर अब डरे हुए भी थे।

वह आदमी जैसे ही बाहर पहुँचा, उसे जेल वाले कपड़ों में देखकर बाहर खड़े लोग थोड़े नाराज़ हो गए।

मगर सामने खड़े आदमी ने पुलिस स्टेशन से बाहर आए आदमी के गले में फूलों का हार डालते हुए खुश होकर कहा, "मुबारक हो रघु भैया! आखिरकार आप जेल से बाहर आ गए। कहो तो पूरा पुलिस स्टेशन उड़वा दें?"

सभी आदमी खुश हो जाते हैं। सभी ने रघु को माला पहनाया और उसके ऊपर फूल बरसाने लगे। रघु की आँखों में अभी भी चंचलता नजर आ रही थी।

उसने हर किसी को देखा, फिर एक की जैकेट पहनते हुए गमछे को अपने सर पर बाँध लिया और अपनी आँखों पर ब्लैक कलर का गॉगल्स लगाते हुए जीप पर बैठते हुए रहस्यमयी मगर चंचल भरी आवाज़ में बोला, "वह तो हमें थोड़ी दया आ गई थी, इसलिए यह लोग हमें अंदर रख पाए।"

एक आदमी ने कहा, "रघु भैया, वैसे सही वक्त पर आप जेल से बाहर आए हैं। चलिए फ्री का खाना खाने चलते हैं। सुना है जिस प्रोफेसर ने आपको जेल भेजा था, उसकी बेटी की आज शादी है। हम भी कुछ फ्री का खाकर आते हैं, वैसे एक बात और अपने कहा था आप जेल के है ये बात किसी को पता न चले, तो हमने आपके घरवालों को पता नहीं चलने दिया।"

सभी हँसने लगे। वहीं रघु के होंठों पर रहस्यमयी मुस्कुराहट थी। वह देखने में जितना चंचल लगता था, उससे भी ज़्यादा डरावना था।

उसके हैंडसम चेहरे को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह किस तरह का इंसान है।

एक के बाद एक जीप वहाँ से निकलने लगी। कुछ देर में वह लोग एक घर के बाहर पहुँचे जो दुल्हन की तरह सजा हुआ था।

रघु जीप से नीचे कूद गया और अपने आँखों पर लगे गॉगल्स को हल्का सा नीचे करते हुए अपनी चंचल आँखों से उस घर को देखने लगा।

एक आदमी हँसते हुए बोला, "रघु भैया, सोचा था यहाँ बैंड बाजा होगा, मगर यहाँ तो कब्रिस्तान जैसा सन्नाटा है। पर कोई बात नहीं, हम तो यहाँ फ्री का खाने आए हैं।"

रघु अजीब तरीके से मुस्कुराया। वह सब एक के बाद एक अंदर पहुँच गए। रघु के चलने का स्टाइल हीरो की तरह तो बिल्कुल नहीं था। ऐसा लग रहा था कोई विलन तबाही मचाने आ रहा है।

रघु जितना मुस्कुराता, लोग उसे उतना ही ज़्यादा डर जाते। आसपास खड़े लोगों ने जब रघु और उसके लोगों को देखा तो और भी ज्यादा डर गए। सभी घुटने के बल बैठ जाते हैं।

किसी की हिम्मत नहीं हुई कि रघु को नज़र उठाकर देखे।

रघु जैसे ही अंदर पहुँचा, अचानक दुल्हन उसके ऊपर गिरी।

रघु ने जल्दी से उस दुल्हन की कमर को कस कर पकड़ लिया। उस दुल्हन का सर रघु के सीने से टकरा गया। रघु नज़रें नीचे करके उस दुल्हन को देखता है, मगर उसकी नज़र दुल्हन के होंठों पर पड़ी तो रघु ने अपनी पकड़ दुल्हन के कमर पर कस ली।

दुल्हन एकदम से रघु से दूर हो गई मगर अभी भी वह घूंघट में थी। रघु ऊपर से नीचे तक दुल्हन को देखता है। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

वह अपनी गर्दन में हाथ फेरते हुए अपनी नज़रों को दुल्हन की कमर पर टिका देता है।

रघु अजीब तरीके से मुस्कुरा कर बोला, "अबे ओ शेरू!"

शूरवीर मुस्कुरा कर बोला, "हाँ भैया।"

रघु रहस्यमयी आवाज़ में बोला, "हमको कौन जेल भेजा था?"

शूरवीर दुल्हन को देखते हुए हँसकर बोला, "इसके पिता ने।"

रघु दिल पर हाथ रखके दुल्हन की कमर को देख बोला, "अबे इस प्रोफेसर की बेटी की कमरिया पर तो हमारा दिल ही अटक गया! अब क्या करें?"

शूरवीर हँसते हुए बोला, "ही ..ही…. भैया, कहो तो उठवा लें, आपका जन्मदिन का तोहफा समझकर।"

तभी पीछे खड़े आदमी ने कुछ सोचते हुए कहा, "रघु भैया, अचानक याद आया, आज आप नाबालिग से बालिग हो गए और उस प्रोफेसर की बेटी से शादी करके आप एक तीर से दो निशाना लगा सकते हैं। उस प्रोफेसर का घमंड भी टूट जाएगा और हमें भाभी भी मिल जाएगी। क्यों, कुत्ते?"

शूरवीर उसके सर पर मारकर बोला, "मुझे केवल रघु भैया ही शेरू कह सकते हैं और निशांत के बच्चे, शांत रह वरना तेरी जिंदगी की सारी शांति मिटा दूँगा।"

निशांत शूरवीर को इग्नोर करके रघु से बोला, "भैया, मैं तो कहता हूँ बन जाओ दूल्हा।"

वहीं अभिनव और उसके लोग रघु को नहीं जानते थे।

रघु को इग्नोर करके उस दुल्हन के दुपट्टे को पकड़ कर हँसते हुए बोले, "भले ही शादी ना हो, मगर चीर हरण तो आज ही होगा।" कहते ही उसने दुल्हन के दुपट्टे को हटा दिया।

अभिनव दुल्हन की कलाई को पकड़ता, कि उससे पहले ही रघु आगे आकर एकदम से दुल्हन की कलाई को पकड़कर उसे अपनी बाहों में खींच लेता है और अपने चश्मे को उतारकर और रहस्यमयी मगर चंचल आँखों से अभिनव को देखकर अजीब तरह से हँसकर बोला, "शेरू, पंडित को मंत्र पढ़ने को बोलो। आज ही हम अपनी दुलहनिया से शादी रचाएँगे।"

दुल्हन के पिता और माँ दोनों डर गए। दुल्हन के पिता तो रघु को जेल से बाहर देखकर ही काफी डर गए थे क्योंकि उन्हें पता था रघु बहुत खतरनाक है।

दुल्हन के पिता रोते हुए बोले, "नहीं नहीं, राघव। तुम अपनी दुश्मनी

मुझसे निकालो, मेरी बेटी से नहीं।"

रघु उनको इग्नोर कर देता है। रघु तो बस दुल्हन को देखे जा रहा था।

कंटिन्यू….

उम्मीद है आप सभी को मेरी ये स्टोरी पसंद आएगी। कमेंट और लाइक करे और फॉलो करे।

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