देवी उस औरत को देख रही थी। देवी की आँखों में एक पल के लिए अजीब-सी ठंडक नज़र आई, मगर अगले ही पल वह अपना सिर नीचे कर लेती है और कसकर अपनी मुट्ठी बंद कर लेती है।
गायत्री जी गुस्से से आगे बढ़ती हैं और उस औरत से कहती हैं, "यह तुम क्या कर रही हो? तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई हमारी बहू पर हाथ उठाने की?"
बहू शब्द सुनकर सभी हैरान हो जाते हैं। पार्टी में मौजूद लोग हैरानी और हैरानी भरी नज़रों से देवी को देखने लगते हैं।
आयुषी, जो अभी खुश थी, उसकी सारी ख़ुशी ग़ायब हो जाती है और वह नाराज़गी से गायत्री जी को देखने लगती है।
वह औरत गायत्री जी को देखते हुए नाराज़ होकर बोली, "दादी जी, मैं आपकी बहुत इज़्ज़त करती हूँ, लेकिन इस लड़की ने मेरी बेटी को धक्का दिया है। मैंने अपनी बेटी को बहुत ही प्यार से पाल-पोसकर बड़ा किया है। इसकी हिम्मत भी कैसे हुई मेरी बेटी को ज़मीन पर गिराने की?"
यह सुनकर गायत्री जी आँखें छोटी करके आयुषी को देखती हैं। फिर कड़क आवाज़ में उस औरत से बोलीं, "वसुधा, अगर तुम्हारी बेटी इतनी ही नाज़ुक है कि हाथ लगने से ही ज़मीन पर गिर जाए, तो बेहतर है उसे अपने घर के अंदर रखो या फिर उसके चारों तरफ़ अंगरक्षक लगा दो।"
वसुधा जी नाराज़ होकर बोलीं, "दादी जी, आप यह क्या कह रही हैं? क्या आप भूल गई हैं कि हम दोनों का परिवार सालों से एक दूसरे के साथ है? क्या एक नई लड़की के आने के कारण आप हमारे साथ इस तरह बात करेंगी? इस लड़की ने मेरी बेटी को मारने की कोशिश की है। अगर आज मैं कोई कदम नहीं उठाऊँगी, तो इसे लगेगा मेरी बेटी को धमकाना आसान है।"
गायत्री जी अजीब तरीक़े से मुस्कुराकर बोलीं, "वसुधा, तो क्या तुम्हें लगता है ठाकुर परिवार की छोटी बहू को धमकाना आसान है? अगर तुम्हें पता न हो तो मैं तुम्हें बता दूँ कि वह राघव सिंह राठौर की पत्नी है। क्या तुम्हें लगता है तुम उस पर हाथ उठाने के बाद आसानी से जा सकती हो? अगर ठाकुर परिवार तुम्हें जाने भी दे, तो क्या राघव तुम्हें छोड़ेगा?"
वसुधा जी देवी को ऊपर से नीचे तक देखती हैं। फिर अजीब तरीक़े से बोलीं, "कौन कहेगा कि यह राघव की पत्नी है? इसकी हालत तो नौकरानी जैसी है। अगर राघव सच में इसे अपनी पत्नी मानता तो इसकी यह हालत नहीं होती। दादी जी, बुरा मत मानिएगा, लेकिन हमारे बच्चे एक साथ पले-बढ़े हैं। मैंने हमेशा राघव को अपना दामाद बनाने का सपना देखा था, लेकिन इस बाहरी लड़की के आने के कारण सब बर्बाद हो गया। मुझे यक़ीन है ठाकुर परिवार ने भी इसे अपनाया नहीं होगा।"
वह अपनी बात पूरी करतीं, उससे पहले ही गायत्री जी अपना हाथ दिखाकर उन्हें रोकते हुए रोब से बोलीं, "बस! बस! हम आपकी नाज़ुक सी बेटी को अपने घर की बहू बनाने की ग़लती नहीं कर सकते, जो एक हाथ लगते ही ज़मीन पर गिर जाए। इस तरह तो अगर किसी दिन वह मर गई तो सारा इल्ज़ाम हमारे परिवार पर आ जाएगा।"
गायत्री जी की बात सुनकर हर कोई हैरान हो गया, मगर जो लोग आयुषी को पसंद नहीं करते थे, वह हँसने लगे।
गायत्री जी अपना सारा ग़ुस्सा देवी के ऊपर उतारती हैं।
उन्होंने सख़्त आवाज़ में कहा, "राघव की पत्नी, तुम यहाँ क्या कर रही हो? क्या तुम्हें तैयार नहीं होना चाहिए था? क्या तुम भूल गई हो, यह तुम्हारे पति के जन्मदिन की पार्टी है?"
देवी शांत थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। देवी ने कसके अपनी मुट्ठी बंद कर ली, मगर उसका हाथ जला था, जिस कारण उसे हल्का-सा दर्द महसूस हुआ।
केतकी जी बिना कुछ बोले वहीं पर खड़ी थीं, मगर वह अंदर से घबराई हुई थीं। उन्होंने खुद से कहा, "अगर राघव को पता चल गया कि देवी पूरे दिन रसोई में थी, तो पता नहीं क्या होगा। मुझे सरला को मना करना चाहिए था।" इतना कहते ही केतकी जी और भी ज़्यादा परेशान नज़र आने लगती हैं।
आयुषी अपना प्रभाव ख़राब नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने गायत्री जी को देखकर कहा, "दादी जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। यह सब कुछ मेरे कारण हुआ है। मेरे कारण राघव के जन्मदिन की पार्टी बर्बाद हो गई और इतना हंगामा मच गया।"
गायत्री जी कठोर आवाज़ में बोलीं, "तो तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारे कारण मेरे पोते की पार्टी बर्बाद हो रही है? अगर पता चल गया है, तो तुम जा सकती हो।"
वसुधा जी हैरान होकर बोलीं, "दादी जी, यह आप क्या कह रही हैं? आप इस अनजान लड़की के लिए हमें भेज रही हैं?"
तभी वहाँ पर एक रोबदार और दबंग आवाज़ सुनाई देती है, "जिसे आप अनजान लड़की कह रही हैं, वह इस घर की बहू है। क्या आपको लगता है आप इस घर की बहू पर उँगली उठाने की हिम्मत रखती हैं?"
सभी उस आवाज़ को सुनकर दरवाज़े की तरफ़ देखते हैं, जहाँ पर अभिमान बिना किसी भाव से खड़ा था।
अभिमान के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, मगर उसकी काली आँखें इस वक़त वसुधा जी के ऊपर थीं।
अभिमान ने ब्लैक शर्ट और ब्लैक पैंट पहना था, जो प्रेस किया हुआ था। वह बहुत ही आकर्षक लग रहा था, पर उसकी आँखें किसी शैतान से कम नहीं थीं।
अभिमान ने अपने एक हाथ में अपना कोट पकड़ा था।
अभिमान के बगल में उसका personal assistant खड़ा था।
आयुषी अभिमान को देखते हुए अपने दाँत को पीस लेती है, मगर फिर उदास होकर बोली, "बड़े भाई, मुझे माफ़ कर दीजिए। असल में, यह सब कुछ मेरी ग़लती है।"
अभिमान लंबे-लंबे क़दमों से अंदर आता है और आयुषी को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है।
अभिमान ने वसुधा जी को देखा और सख़्त आवाज़ में कहा, "जिस किसी ने भी ठाकुर परिवार की तरफ़ उँगली उठाई है, आज तक उसका अंजाम अच्छा नहीं हुआ है, और आपने तो सीधा हाथ उठा दिया।"
वसुधा जी को अंदर से डर लगने लगा। अभिमान का औरा वहाँ पर ठंडक पैदा कर रहा था। अभिमान की शख़्सियत ऐसी थी कि कोई भी डर जाए।
अभिमान देवी की तरफ़ देखता है और उसे ऑर्डर देता है, "ऊपर जाओ और राघव को भेजो।"
देवी नज़रें उठाकर अभिमान की आँख में देखती है, मगर अभिमान की आँखें इतनी रहस्यमय और क्रूर थीं कि दो सेकंड से ज़्यादा उसकी आँखों में नहीं देख पाई।
अभिमान इस बार भारी आवाज़ में बोला, "जाओ।"
देवी अपने होंठों को आपस में दबा लेती है और तुरंत चली जाती है। उसका दिल घबरा रहा था।
उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में अभिमान जितना रहस्यमय और क्रूर इंसान नहीं देखा था और न ही उसने कभी भी ख़तरा महसूस किया था। उसे पता चल गया था अभिमान कोई सामान्य इंसान नहीं है।
वसुधा जी डरकर दो क़दम पीछे लेते हुए बोलीं, "अभिमान, तुम क्या करने की कोशिश कर रहे हो?"
अभिमान अपनी नज़र उठाकर अपने निजी सहायक को देखता है। असिस्टेंट तुरंत दरवाज़े को अंदर से बंद कर लेता है।
यह देखकर आयुषी को भी घबराहट होने लगी और उसने अभिमान को देखकर पूछा, "बड़े भाई, आप क्या कर रहे हैं?"
अभिमान बिना भाव से बोला, "मेरी कोई बहन नहीं है, इसलिए अपना मुँह बंद रखो।"
फिर अभिमान वसुधा जी को देखते हुए उनके सवाल का जवाब देता है, "मैं बस आपको जाने से रोक रहा हूँ ताकि राघव यह न कह सके कि मैंने आपको जाने दिया।"
वसुधा जी घबराहट से बोलीं, "अभिमान, तुम..."
मगर अभिमान उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है और चुपचाप सोफ़े पर बिना किसी भाव से बैठ जाता है, जैसे वह कहीं का राजा हो।
हर कोई अभिमान से डरता था, इसीलिए पूरी भीड़ चुप थी। किसी के अंदर हिम्मत नहीं थी कुछ बोल सके।
देवी का हाथ दीवार से टकरा जाता है, इसलिए वह रास्ते में ही रुक जाती है और अपने जले हुए हाथ को देखते हुए उस पर फूंक मारती है।
उसे बहुत जलन महसूस हो रही थी। देवी की पलकें अभी भीगी हुई थीं, मगर ऐसा लग रहा था कि वह अपने दर्द को रोक रही हो।
"आह!" देवी दर्द से कराह उठी।
ठीक उसी वक़त एक कठोर हाथ ने देवी के हाथ को पकड़ लिया। देवी चौंकते हुए पीछे पलटकर देखती है, तो वहाँ पर राघव खड़ा था।
राघव के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। राघव बिना किसी भाव से देवी के हाथ को पकड़कर उसे देख रहा था।
देवी के हाथ का पिछला हिस्सा जला था, जो पूरी तरह से लाल पड़ा था। अभी तक देवी ने उस पर दवा नहीं लगाया था, इसलिए छाले पड़ गए थे।
राघव की आँखों में अजीब-सी चमक नज़र आई। राघव की आँखें अगले ही पल निर्दयी और क्रूर हो गईं। उसकी पकड़ देवी के हाथ पर कस गई।
"आह! छोड़िए!" देवी दर्द सहते हुए बोली। क्योंकि राघव ने उसके हाथ को बहुत ही ताक़त लगाकर पकड़ा था, और राघव की आँखों में जैसे पागलपन नज़र आने लगा।
उसकी आँखें लाल पड़ गईं।
देवी जैसे ही उसकी आँखों में देखती है, उसकी रीढ़ की हड्डी काँप गई। वह सोचने लगी, "राघव केवल चेहरे से ही आकर्षक है, बाकी वह पूरा राक्षस है।"
राघव धीमी, मगर डरावनी आवाज़ में बोला, "किसने किया यह?"
देवी कोई जवाब नहीं देती है। राघव ग़ुस्से से बोला, "मैंने पूछा, किसने किया यह?"
देवी अपनी नज़रें फेर लेती है, मगर कोई जवाब नहीं देती है। राघव देवी के चेहरे पर उँगलियों के निशान अभी नहीं देख पाया था।
राघव उसे एक पल के लिए देखता है। फिर उसे ज़बरदस्ती पार्टी में लेकर आ गया। राघव इस वक़त देवी के साथ सीढ़ियों के ऊपर खड़ा था।
राघव ने हर किसी को देखा। हर किसी को वहाँ पर ख़तरा महसूस होने लगा। उन्हें महसूस हुआ, ख़तरा सीढ़ियों की तरफ़ से आ रहा है, तो सभी अनजाने में उस तरफ़ देखने लगे।
राघव चारों तरफ़ जाँचने के बाद एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर बोला, "किसकी हिम्मत हुई राघव की दुल्हनिया को हाथ लगाने की?"
सरला जी, जो काफ़ी सजी-धजी थीं, वह इसी वक़त वहाँ पर पहुँचीं और राघव के सवाल को सुनते ही डरकर दो क़दम पीछे हो गईं।
उन्हों
ने देखा राघव ने देवी के उस हाथ को पकड़ा है, जिसे उन्होंने जलाया था, तो डरकर उनका चेहरा पीला पड़ गया।
राघव देवी को लेकर नीचे जाने लगा।
कंटिन्यू…..
आगे जानने के लिए बने रहे।




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