12

" Aap karib kyu aa rahe hai"

राघव मुस्कुराते हुए वसुधा जी को देख रहा था। वह लगातार वसुधा जी की कलाई में खंजर घुसा रहा था।

खून फर्श पर गिरने लगा। वसुधा जी यह देखकर बहुत डर गईं। उन्होंने गायत्री जी को देखकर रोते हुए कहा, "दादी जी! राघव को रोकिए! वह क्या कर रहा है? मेरे हाथ से खून निकल रहा है। क्या यह मुझे मारना चाहता है?"

गायत्री जी होश में आती हैं और तुरंत राघव को समझकर बोलीं, "राघव, यह तुम क्या कर रहे हो? तुम इस तरह किसी का खून नहीं कर सकते। छोड़ो राघव, यह हमारा घर है। तुम यहां पर किसी का खून नहीं कर सकते!"

राघव बिल्कुल नहीं रुका। गायत्री जी अभियान को देखकर घबराते हुए बोलीं, "अभियान! राघव को रोको! वह क्या कर रहा है?"

अभियान अपने कंधे उचकाकर बहुत ही आराम से जवाब देता है, "दादी, मैं आपकी कोई हेल्प नहीं कर सकता।"

गायत्री जी गुस्से से बोलीं, "यह तुम क्या बोले जा रहे हो? राघव किसी का खून कर रहा है और तुम उसे रोकने के बजाय आराम से बैठे हुए हो! क्या तुम चाहते हो वह गलत काम करे?"

अभियान आयुषी को देखता है जिसकी हालत पहले से ही बुरी थी। उसने बहुत ही आराम से जवाब दिया, "वह तो पहले ही गलत काम कर चुका है।"

गायत्री जी को यकीन हो गया कि अभियान उनकी कोई मदद नहीं करेगा। उन्होंने तुरंत राघव का हाथ पकड़ कर गुस्से से कहा, "राघव! छोड़ो उसे!"

राघव बिल्कुल भी वसुधा जी को नहीं छोड़ता है। वसुधा जी के हाथ से पहले के मुकाबले और भी ज्यादा खून बहने लगता है।

वसुधा जी रोने लगीं। अपना इतना खून बहते हुए देखकर उन्हें चक्कर आ रहा था। शूरवीर और निशांत चुपचाप खड़े थे।

गायत्री जी की नजर देवी पर गई। उन्होंने तुरंत देवी का हाथ पकड़ कर कहा, "देवी! राघव को रोको! क्या तुम चाहती हो वह कातिल बन जाए और लोग उसे कातिल कहना शुरू कर दें?"

देवी अपने हाथ को देख रही थी, जिसे गायत्री जी ने पकड़ा हुआ था। उसे देखकर बिल्कुल नहीं लग रहा था कि वह राघव को रोकना चाहती है।

गायत्री जी को हल्का गुस्सा आ जाता है। उन्होंने देवी को गुस्से में देखते हुए कहा, "क्या तुम्हें पता है यह सब कुछ तुम्हारे कारण हो रहा है? वह तुम्हारे कारण ही किसी को जान से मारने वाला है और तुम चुपचाप खड़ी होकर देख रही हो? अगर तुम्हारे कारण हमारे पोते को कुछ भी हुआ तो हम तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।"

देवी नजर घुमा कर वसुधा जी के हाथ को देखती है जिसमें से खून बह रहा था।

देवी जो अभी तक चुप थी, उसने दबी हुई मगर धीमी आवाज में कहा, "दादी, यह तो थोड़ा सा खून है।"

देवी की आवाज बहुत ही आकर्षक (अट्रैक्टिव) और पतली थी। जो भी इस आवाज को सुनता, उसे आवाज से प्यार हो जाता, मगर सिचुएशन कुछ अलग थी। दादी उसकी बात सुनकर हैरान थीं।

वसुधा जी और आयुषी ने भी पहली बार देवी की आवाज सुनी थी। उन्हें उसकी आवाज बहुत पसंद आई थी मगर उसके शब्दों को सुनकर मन कर रहा था कि देवी का गला दबा दें।

राघव तिरछी मुस्कुराहट के साथ देवी को देखता है। गायत्री जी गुस्से से बोलीं, "तुम कैसी पत्नी हो? तुम अपने पति को रोकने के बजाय चुपचाप खड़ी हो?"

देवी को अच्छे से याद था कि राघव के जाने के बाद उसके साथ कैसा बर्ताव किया गया था। देवी अंदर ही अंदर बदले की भावना पाल रही थी।

देवी के सामने गायत्री जी ने चाहे जितनी मिन्नतें की हों, देवी ने बिल्कुल नहीं सुना।

वह बिल्कुल एक पत्थर दिल की तरह अपनी जगह पर खड़ी थी।

जब वसुधा जी लगभग बेहोशी की हालत में आ गई थीं, तब जाकर देवी ने हल्के से राघव की जैकेट को पकड़ लिया और धीमी आवाज में बोली, "छोड़ दीजिए।"

राघव काफी देर तक देवी को देख रहा था। फिर उसने धीरे-धीरे अपने हाथ को वसुधा जी के हाथ से हटा लिया।

खंजर जैसे ही जमीन पर गिरा, शूरवीर तुरंत खंजर को उठाकर उसमें से खून साफ करने लगा। वसुधा जी बेहोश हो गई थीं।

आयुषी की भी हालत ठीक नहीं थी। गायत्री जी ने निशांत को देखते हुए कहा, "इन्हें अस्पताल लेकर जाओ, अभी और इसी वक्त!"

निशांत का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था, मगर गायत्री जी ने कहा था, इसीलिए वह राघव की परमिशन लेने के लिए राघव को देखता है।

राघव उसे नहीं देख रहा था। गायत्री जी डांटकर बोलीं, "क्या तुम्हें सुनाई नहीं दे रहा है? मैंने कुछ कहा है!"

निशांत अपने फोन को निकालते हुए बोला, "मैं एंबुलेंस बुलाता हूँ।" इतना कहते ही वह अपने फोन को लेकर बाहर चला गया क्योंकि राघव ने उसे मदद करने को नहीं कहा था, इसलिए वह बिल्कुल भी उन दोनों को अस्पताल लेकर नहीं जाने वाला था।

गायत्री जी शूरवीर को देखते हुए बोलीं, "शूरवीर!"

शूरवीर वहां से जाते हुए बोला, "मैं... मैं यहां सफाई करने के लिए किसी को बुलाता हूँ।" इतना कहते ही वह भी चला गया।

गायत्री गहरी सांस लेती हैं। उन्होंने वहां मौजूद मेहमानों को देखते हुए हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा, "आप सब आज यहां आए, हमें बहुत अच्छा लगा, लेकिन अब यह पार्टी यहीं समाप्त होती है। खाने का बंदोबस्त गार्डन में है, आप लोग वहां जा सकते हैं।"

सभी लोगों ने पहले ही तमाशा देख लिया था। यह सब राघव ने किया था, इसीलिए किसी को ज्यादा हैरानी नहीं थी। अब वह सभी अपना पेट भरने के लिए गार्डन साइड जाने लगे। अब पूरे हॉल में केवल घर के लोग मौजूद थे।

गायत्री जी ने राघव को डांट कर बोलीं, "जाओ अपने रूम में! आज तुमने बहुत तमाशा किया है।"

राघव अपने हाथ को सीने पर बांधते हुए बोला, "दादी, ऐसे कैसे चले जाएं? हम जिस काम के लिए आए थे वह तो अभी पूरा भी नहीं हुआ।"

गायत्री जी को कुछ बुरा होने का एहसास हो रहा था। उन्होंने आंखें दिखाकर कहा, "इतना कुछ करने के बाद तुम कह रहे हो कि तुम जो काम करने आए थे वह किया ही नहीं है!"

राघव देवी के हाथ को पकड़ता है, जो जला हुआ था। उसने ठंडी मुस्कुराहट के साथ कहा, "अभी तक हमें यह पता नहीं चला है कि हमारी दुल्हनिया को किसने जलाया?"

गायत्री जी देवी के हाथ को देखती हैं जो जला हुआ था। उनके चेहरे के भाव बदल जाते हैं। उन्होंने नोटिस किया कि देवी के जले हाथ पर अभी भी दवा नहीं लगी थी।

गायत्री जी नॉर्मल एक्सप्रेशन के साथ बोलीं, "तुम्हारी पत्नी का हाथ जला है और तुम यहां पर खड़े होकर तमाशा कर रहे हो? क्या तुम्हें डर नहीं कि उसे दर्द हो रहा होगा? जाकर उस पर दवा लगाओ।"

राघव बिना भाव से बोला, "क्या आप अपराधी को बचाने की कोशिश कर रही हैं?"

दादी सख्त आवाज में बोलीं, "राघव, आज तुम बहुत मनमानी कर रहे हो। तुमने इतना तमाशा किया है, फिर भी हम कुछ नहीं कह रहे। अब जाकर इस पर दवा लगाओ और बाकी बातें भूल जाओ।"

राघव आइब्रो ऊपर करके बोला, "कभी नहीं! हम खुद पता लगा लेंगे यह सब कैसे हुआ। वह इंसान चाहे जो हो, हमें फर्क नहीं पड़ता। हमें जो करना होगा, हम करेंगे।"

इतना कहने के बाद राघव देवी के हाथ को पकड़ कर उसे रूम की तरफ लेकर जाने लगा।

राघव के जाने के बाद गायत्री जी के एक्सप्रेशन काफी सीरियस हो जाते हैं।

अभियान गायत्री जी के एक्सप्रेशन देख रहा था। उसने अंदाजा लगाते हुए ठंडी आवाज में कहा, "क्या उसे जलने से आपका कोई लेना देना है?"

गायत्री जी गहरी सांस लेकर तेज आवाज में बोलीं, "अभियान, अपनी बुआ को उनके ससुराल छोड़ने की तैयारी करो और अपनी मां को कुछ दिन के लिए मायके भेज दो।"

अभियान आंखें छोटी कर लेता है। पर उसे थोड़ा-थोड़ा अंदाजा हो गया था।

वह अपनी जगह से खड़ा हो जाता है और अपने शर्ट को सही करते हुए बिना भाव से बोला, "आपको क्या लगता है, ऐसा करके आप राघव से छुटकारा पा सकते हैं?"

गायत्री जी गुस्से से बोलीं, "हमने जितना कहा है उतना करिए, बाकी हम खुद देख लेंगे।"

इतना कहते ही वह चली गईं। अभियान के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसने एक नजर बेहोश वसुधा जी को देखा।

फिर एक नौकर से बोला, "इन्हें होश में लाओ।" कहकर वो चला गया।

देवी बेड पर बैठी थी। वह राघव को घूर रही थी। राघव दवाई लाकर देवी के हाथ में लगाने वाला था, लेकिन देवी तुरंत अपने हाथ को पीछे कर लेती है।

राघव उसे गहरी (डार्क) नज़रों से देखता है, फिर आराम से बोला, "तो हमारी दुल्हनिया के भी नखरे हैं।"

देवी उसकी बात को नज़रअंदाज़ कर देती है। देवी उठकर जाने लगती है, मगर राघव उसकी कलाई को कस कर पकड़ते हुए मुस्कुराया।

मगर राघव की आंखों में गहराई (डार्कनेस) साफ नजर आ रही थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बैठो!"

भले ही उसके होठों पर मुस्कुराहट थी, मगर उसके बोलने के लहजे में धमकी थी।

देवी गुस्से में थी। उसने अपने हाथ को छुड़ाते हुए गुस्से से कहा, "छोड़िए हमें! हमें आपसे दवा नहीं लगवानी है। यह अच्छा है! परिवार वाले ज़ख्म दें और बेटा मरहम लगाए!"

राघव की गहरी आंखें देवी के ऊपर थीं। उसने धमकी देते हुए कहा, "दुल्हनिया, प्यार से कह रहे हैं, बैठ जाओ।"

देवी एक झटके से अपने हाथ को राघव की पकड़ से छुड़ा लेती है। फिर उसे धमकी देकर बोली, "और अगर नहीं बैठे तो आप हमारा क्या बिगाड़ लेंगे? शादी तो जबरदस्ती आप कर चुके हैं। इससे ज्यादा आप हमारे साथ और क्या कर सकते हैं?"

राघव की आंखें ठंडी पड़ गईं। उसके आसपास का तापमान बढ़ने लगा था।

वह अजीब तरीके से हँसा, फिर खड़े होकर देवी की तरफ अपने कदम बढ़ाकर शांत आवाज में बोला, "ऐ दुल्हनिया, हम क्या कर सकते हैं यह तुम पूछ रही हो या फिर जानना चाहती हो?"

देवी तुरंत अपने कदम पीछे ले लेती है। देवी ने देखा राघव अभी भी उसके करीब आ रहा है, तो वह दांत पीसते हुए बोली, "आप करीब क्यों आ रहे हैं?"

राघव अपने एक हाथ को गर्दन पर फेरते हुए, ऊपर से नीचे तक देवी को देखकर बोला, "क्या तुम्हें नहीं जानना कि हम क्या कर सकते हैं?"

देवी को राघव की नीयत ठीक नहीं लग रही थी।

राघव एक झटके से देवी को दीवार से लगाकर अपने दोनों हाथों को देवी के किनारे (साइड में) रख देता है। देवी राघव की आंखों में ज्यादा देर तक नहीं देख पा रही थी। राघव की आंखों

में एक अलग ही आग नजर आ रही थी।

देवी घबरा गई क्योंकि राघव की नाक उसके नाक से छू रही थी। देवी उसकी गर्म सांसों को अपने चेहरे पर महसूस कर पा रही थी।

कंटिन्यू….

आगे जानने के लिए बने रहे।

Write a comment ...

Write a comment ...