राघव बहुत ही जिद्दी था इसलिए उसने वही टी-शर्ट पहनी जो देवी ने पहनी थी।
राघव कल ही देवी के लिए कपड़े लेकर आया था इसलिए देवी ने नहाकर वही पहना था।
देवी ने एक बेबी पिंक कलर की साड़ी पहनी थी जो पूरी तरह से सिंपल थी मगर बीच-बीच में क्रिस्टल लगे हुए थे।
देवी का ब्लाउज थोड़ा स्टाइलिश था, जो फुल आस्तीन का था मगर कंधे के पास डिजाइन बना हुआ था और एक बड़ी सी तितली (Butterfly) भी बनी थी जिस पर ढेर सारे क्रिस्टल लगे हुए थे।
देवी ने बाल खुले रखे थे, उसने मांग में सिंदूर लगाया था और गले में मंगलसूत्र पहना था। हाथों में लाल रंग की चूड़ियाँ पहनी थी।
देवी ने अपने आसपास देखा, राघव वहाँ नहीं था। उसने अपने हाथ में दवा लगाई और फिर बाहर चली गई।
जब देवी नीचे पहुँची तो उसने देखा हॉल में गायत्री जी बैठी हुई थीं, उनके सामने वाले सोफे पर राघव मौजूद था। राघव ने वही टी-शर्ट पहनी थी जो उसने पहनी हुई थी।
राघव ने ऊपर से एक जैकेट भी पहनी थी और डेनिम जींस पहनी थी।
उसके सिल्की बाल माथे पर बिखरे थे। वह बहुत ही हैंडसम लग रहा था। देवी एक पल के लिए उसे देखती रह जाती है, मगर अगले ही पल वह उससे नज़रें हटा लेती है।
गायत्री जी जैसे ही देवी को देखती हैं, उन्होंने सख्त आवाज में कहा, "राघव की पत्नी, इधर आओ।"
देवी गहरी सांस लेती है। राघव उसे देखकर हल्के से मुस्कुराता है।
उसकी मुस्कुराहट देखकर देवी चिढ़ जाती है, मगर फिर भी एक भोली-भाली बहू की तरह उसने अपने सर पर पल्लू रखा और गायत्री जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
गायत्री जी खुश होकर बोलीं, "सदा सुहागन रहो और जल्दी हमारे परपोते या परपोती को जन्म दो।"
यह सुनते ही देवी का खून ठंडा पड़ जाता है, मगर वह कुछ भी नहीं बोलती है।
गायत्री जी सामने मौजूद थाली को देखती हैं और देवी से बोलीं, "राघव की पत्नी, मेरी बात ध्यान से सुनो। हमारा परिवार रीति-रिवाजों को बहुत मानता है। तुम ठाकुर परिवार की छोटी बहू हो और इसके साथ ही राघव की पत्नी हो। कल हमने राघव के लिए जन्मदिन की पार्टी रखी थी जो खराब हो गई। पंडित जी ने कहा है, यह एक बहुत बड़ी गलती है। इससे आगे चलकर हमारे पोते पर मुसीबत आ सकती है क्योंकि इतना बड़ा शुभ दिन खराब हुआ है और खून-खराबा हुआ है। इसलिए उन्होंने कहा है, तुम और राघव मंदिर जाओ। पंडित जी वहाँ पहले से ही मौजूद होंगे। याद रखना, कार से तुम दोनों सिर्फ गाँव तक जा सकते हो, उसके बाद तुम दोनों को ही नंगे पाँव मंदिर तक जाना है और सीढ़ियों पर राघव तुम्हें उठाकर ले जाएगा, क्योंकि यह भी एक रिवाज है। आगे क्या करना है, वह तुम्हें पंडित जी वहीं बताएँगे। जो-जो सामान लेकर जाना है, वह मैंने पहले ही नौकरों को पैक करने के लिए कह दिया है।"
इतना कहते ही वह अपनी जगह से खड़ी हो गईं। फिर राघव को देखकर बोलीं, "याद रखना, एक भी गलती नहीं होनी चाहिए।" इतना कहने के बाद गायत्री जी वहाँ से जाने लगती हैं।
देवी उन्हें जाते हुए देखती है। अब पूरे हॉल में राघव और देवी के अलावा कोई नहीं था। देवी उसे ठंडी नज़रों से देखती है।
राघव उसे शरारती नजर से देखकर अपना एक हाथ सीने पर रखता है और फ्लर्टी आवाज में बोला, "हे दुल्हनिया, बहुत खूबसूरत लग रही हो।"
देवी झुंझला कर बोली, "खून-खराबा आपने किया था तो मंदिर मैं क्यों जाऊँ? बेहतर होगा, आपके ऊपर ही पाप चढ़े। इतने तो पाप किए हैं, एक और पाप चढ़ने से कुछ नहीं होगा।"
राघव अजीब तरीके से मुस्कुराया और देवी के करीब बढ़कर अपनी रहस्यमयी आँखों से उसे देखते हुए गहरी आवाज में बोला, "हे दुल्हनिया, बहुत बोलने लगी हो तुम। जब हम शादी कर रहे थे, तब तो एक आवाज़ भी तुम्हारे मुँह से नहीं निकल रही थी। मुझे तो गलतफहमी हो गई थी, कहीं हमरी दुल्हनिया गूँगी तो नहीं है?"
इतना कहते ही राघव उसके हाथ को पकड़ लेता है। देवी कुछ कहने वाली थी, मगर उसे महसूस हुआ गायत्री जी उधर ही आ रही थीं, तो वह चुप हो गई।
राघव आइब्रो ऊपर कर लेता है। उसने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "हमरे सामने शेरनी और दूसरों के सामने भीगी बिल्ली।"
देवी गहरी सांस लेती है और उसके साथ बाहर जाने लगी। गायत्री जी दोनों को बाहर तक छोड़ती हैं।
भले ही उन्होंने कुछ न कहा हो, मगर वह जान गई थीं देवी राघव को पसंद नहीं करती है।
जैसे ही राघव और देवी निकले, पीछे वाली कार से शूरवीर और निशांत भी जाने वाले थे।
गायत्री जी दोनों को देखती हैं और ठंडी आवाज में बोलीं, "कुछ करो ताकि ये दोनों करीब आएँ और मुझे इस घर का नया चिराग मिले।"
शूरवीर घबराकर निशांत को देखता है और निशांत उसे। फिर दोनों कार में बैठकर निकल गए।
दो घंटे में वे लोग गाँव पहुँच गए।
कार से बाहर निकलते ही देवी आस-पास देखती है। राघव आँखों में चश्मा लगाते हुए कार से बाहर निकला।
शूरवीर और निशांत भी बाहर निकले। उन दोनों के पीछे गार्ड्स मौजूद थे जिनके हाथ में थालियाँ थीं और वह लाल कपड़े से ढका हुआ था।
देवी पूजा की थाली हाथ में लेती है। गाँव में काफी अच्छा वातावरण था, हल्की शुद्ध हवा चल रही थी जिस कारण देवी को काफी अच्छा लग रहा था।
देवी आगे-आगे चलने लगी। राघव आइब्रो ऊपर करके उसे घूरता है क्योंकि देवी गाँव के अंदर जा रही थी।
शूरवीर जल्दी से उसके पास जाकर बोला, "भाभी जी, वहाँ नहीं जाना है। मंदिर दूसरी तरफ है।"
देवी रुक गई। तभी उसकी नजर राघव की नजरों से टकराई। ऐसा लग रहा था जैसे राघव उसका मज़ाक उड़ा रहा हो। देवी गुस्से से शूरवीर को देखने लगी।
शूरवीर निशांत के पास चला गया और हैरानी से बोला, "क्या मैंने कुछ गलत कह दिया जो भाभी गुस्से में है?"
निशांत मुस्कुराकर बोला, "अबे ढक्कन, बेहतर होगा तुम भाभी और रघु भैया के बीच न बोलो।"
शूरवीर बस कंधे ऊपर कर देता है।
राघव देवी के हाथ को पकड़ने की कोशिश करता है, मगर देवी अजीब तरह से मुस्कुराते हुए अपना पल्लू उसकी हथेली पर रखते हुए बोली, "हाथ मत पकड़िए, पल्लू पकड़िए। वरना आप जैसा बच्चा अगर खो गया तो मैं दादी को जवाब नहीं दे पाऊँगी।"
राघव आइब्रो ऊपर कर लेता है।
शूरवीर और निशांत हैरान हो
गए। दोनों तिरछी नज़रों से राघव को घूरने लगे जिसका चेहरा देखने लायक था।
कंटिन्यू……
आगे जानने के लिए बने रहे।




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