राघव मुंह बनाता है, फिर स्टाइल से अपनी आँखों पर गॉगल्स लगाता है और देवी के पीछे चलने लगता है।
आगे एक बॉडीगार्ड मौजूद था जो मंदिर का रास्ता दिखा रहा था। शूरवीर और निशांत ने देखा कि राघव को गुस्सा नहीं आया, तो दोनों राहत की साँस लेते हैं और पीछे-पीछे जाने लगते हैं।
कई गाँव वाले राघव को पहचानते थे, वे सभी हैरानी से राघव को देख रहे थे, फिर उसके आगे चल रही देवी को देखने लगे।
कई लड़कियाँ राघव को देख रही थीं। वे सभी राघव को जानती थीं, वे सभी देवी को देखने लगीं, जैसे जानने की कोशिश कर रही हों कि आखिर देवी कौन है।
तीन लड़कियाँ निशांत और शूरवीर के पीछे जाने लगती हैं। मंदिर थोड़ा दूर था। देवी एक हाथ से अपनी साड़ी को संभाल रही थी और दूसरे हाथ से पूजा की थाली को। देवी सामने की तरफ देख रही थी क्योंकि आसपास हरियाली थी, जो देखने में काफी अच्छी लग रही थी।
अचानक देवी के पैर के नीचे एक पत्थर आ जाता है।
देवी गिरने लगी, मगर राघव तुरंत उसकी कमर में हाथ डालकर उसे गिरने से बचा लेता है और राघव देवी को देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, "दुल्हनिया, तुम क्यों नहीं मान लेती कि तुम हमरे बिना एक कदम भी नहीं चल सकती हो।"
देवी गुस्से से उसके हाथ को हटाकर बोली, "हमें हाथ मत लगाइए, और आपको तो बस छूने का बहाना चाहिए।"
राघव चुपचाप उसे देख रहा था। देवी ने देखा वह कुछ भी नहीं कह रहा है, तो वह राघव को इग्नोर कर देती है और गार्ड के पीछे जाने लगती है।
देवी ने अपनी स्पीड बढ़ा दी थी ताकि राघव उसके पास न आ सके, मगर राघव उसके पीछे-पीछे ही चल रहा था। देवी चिढ़कर (इरिटेट होकर) कुछ नहीं बोली और राघव उसे ही घूर रहा था।
देवी को महसूस हो रहा था कि राघव लगातार बस उसे देख रहा है। जब उससे बर्दाश्त नहीं होता तो वह रुक जाती है। राघव भी रुक जाता है।
देवी गहरी साँस लेकर राघव की आँखों में देखकर बोली, "क्या चाहिए आपको? क्यों इतनी देर से मुझे घूरे जा रहे हैं?"
राघव देवी के गुस्से भरे चेहरे को देखता है तो उसे काफी अच्छा लगता है।
वह अपना एक हाथ जेब में डालकर गहरी आवाज़ में बोला, "अब हम अपनी दुल्हनिया को नहीं देखेंगे तो किसको देखेंगे? इस गार्ड को?"
तभी देवी की नज़र पीछे आ रही तीनों लड़कियों पर पड़ी। देवी ने महसूस कर लिया था, जिस तरह से वे तीनों लड़कियाँ राघव को देख रही थीं, वह नज़रिया कुछ अलग था। देवी का गुस्सा थोड़ा और बढ़ जाता है।
देवी राघव को इग्नोर करके गुस्से से आगे बढ़कर बोली, "मधुमक्खियाँ।"
राघव पूरे रास्ते देवी को परेशान कर रहा था। कभी जानबूझकर उसे छू रहा था, कभी उसे टक्कर मार रहा था। आखिरकार वे लोग मंदिर पहुँच जाते हैं तो देवी एक राहत की साँस लेती है। पंडित जी बाहर मौजूद थे।
गायत्री जी ने जो कहा था, देवी को याद था। देवी ने अपने सिर पर पल्लू किया और पंडित जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। राघव भी पंडित जी के पैर छूता है।
पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले, "हमेशा खुश रहो।"
पंडित जी राघव को देखते हैं। उनके चेहरे पर गंभीर भाव (सीरियस एक्सप्रेशन) आ जाते हैं।
पंडित जी ने राघव को देखते हुए कहा, "तुम्हें अपनी पत्नी को उठाकर सीढ़ियों से अंदर तक जाना है। याद रखना, इस बीच तुम रुक नहीं सकते हो और न ही अपनी पत्नी को उतार सकते हो।"
राघव बिना किसी भाव से खड़ा था। उसने देवी को ऊपर से नीचे तक देखा और एक झटके से उसे उठा लिया। देवी इसके लिए तैयार नहीं थी इसलिए वह तुरंत उसे कसकर पकड़ लेती है।
वहाँ पर कई लोग मौजूद थे, वे गुस्से से राघव को देखने लगते हैं, मगर राघव एकदम सामने देख रहा था। वह इतना गंभीर था कि देवी हैरान थी, क्योंकि राघव की पर्सनैलिटी एकदम से बदल गई थी।
अब वह बिल्कुल खलनायक जैसा लग रहा था। राघव देवी को लिए सीढ़ियों से होते हुए मंदिर के अंदर जाने लगता है। काफी सीढ़ियाँ थीं, इसलिए चढ़ने में समय लग रहा था।
निशांत और शूरवीर गार्ड्स के साथ इस वक़्त नीचे मौजूद थे। जो तीन लड़कियाँ आई थीं, वे सभी जलन से देवी को देख रही थीं। उन तीनों ने ही घाघरा चोली पहना हुआ था।
तीनों की उम्र लगभग 19 से 20 साल लग रही थी। एक लड़की आगे बढ़ती है और निशांत से बोली, "राघव के साथ वह लड़की कौन है?"
उसकी आवाज़ में जलन साफ सुनाई पड़ रही थी। निशांत और शूरवीर के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह लड़की इस बार मुँह बनाकर बोली, "अरे, तुम ऐसे क्यों बर्ताव कर रहे हो जैसे हमें जानते ही नहीं हो? हम पिछले साल ही तो मिले थे।"
दूसरी लड़की आगे बढ़ती है, वह थोड़ी डरी हुई और मासूम लग रही थी।
उसने अपने होंठ को दबाया और शूरवीर से बोली, "क्या आप भूल गए? पिछले साल जब आप लोग ठाकुर परिवार के साथ आए थे तब हमनें ही पूजा की तैयारी में हाथ बँटाया था और पूरे ठाकुर परिवार का ध्यान रखा था। हम कई बार मिले भी थे।"
शूरवीर पत्थर की तरह खड़ा था। उस लड़की को देखकर लग रहा था जैसे वह रोने वाली हो और शूरवीर ने उसे धमकाया हो। यह देखकर शूरवीर को गुस्सा आ रहा था।
उस लड़की की आँखों में आँसू देखकर तीसरी लड़की हल्के गुस्से से बोली, "यह तो एक छोटा सा सवाल है। तुमने गौरी को क्यों रुला दिया? पता है ना वह कितनी मासूम है।"
शूरवीर बिना भाव से बोला, "अगर वह मासूम है तो उसे घर में बंद रहना चाहिए। वह ऐसा बर्ताव क्यों कर रही है कि हमने उसके साथ बदतमीज़ी की है? हम उसे जानते भी नहीं हैं।"
गौरी अपने बगल में खड़ी दोनों लड़कियों को देखकर बोली, "शिवानी, माला, रहने दो। शायद मैं इन लोगों को परेशान कर रही हूँ।"
शिवानी गुस्से से बोली, "तुमने तो बस एक सवाल पूछा है, मगर ये लोग ऐसे घमंड दिखा रहे हैं जैसे पता नहीं हमने इनसे इनकी प्रॉपर्टी मांग ली है।"
माला भी गुस्से से बोली, "देखो, तुम्हारे कारण गौरी की आँखों में आँसू आ गए हैं। इस बात को हम जाने नहीं देंगे। चलो मुखिया को बताते हैं।"
गौरी घबराकर बोली, "नहीं, रहने दो। यह सब मेरी ही गलती है। मुझे इनसे माफ़ी माँगनी चाहिए।"
शूरवीर और निशांत को बहुत ही ज़्यादा चिढ़ (इरिटेशन) हो रही थी। उन्हें गौरी का यह मासूम भरा नाटक देखकर उल्टी जैसा महसूस हो रहा था।
दोनों ही मंदिर के अंदर चले जाते हैं। मंदिर के अंदर पंडित जी ने राघव को देवी को गोद में लेकर सात बार परिक्रमा करने को कहा था।
राघव जैसे ही देवी को लेकर पंडित जी के पास पहुँचता है, पंडित जी एक पूजा करते हैं। पूजा जैसे ही खत्म होती है, वे लोग आशीर्वाद लेते हैं और मंदिर के बाहर चले जाते हैं।
बाकी काम पंडित जी को करना था। गार्ड्स जो भी सामान लेकर आए थे, वह पहले ही पंडित जी को दे देते हैं, जिनमें से कुछ चीज़ें दान करनी थीं।
देवी महसूस कर रही थी कि राघव का बर्ताव अजीब हो गया था। जब से राघव ने मंदिर के अंदर कदम रखा था, तब से लेकर अभी तक राघव ने उसे परेशान नहीं किया, बल्कि वह बिल्कुल एक घमंडी और खडूस सीईओ की तरह बर्ताव कर रहा था।
मंदिर से बाहर आते ही गौरी एकदम से राघव के सामने आ जाती है।
गौरी शरमाते हुए बोली, "राघव, क्या तुम गाँव आना चाहोगे? मेरी माँ ने तुम्हारी मनपसंद खीर बनाई है। वह तुम्हें बहुत याद करती है।" देवी ऊपर से नीचे तक गौरी को देख रही थी। गौरी ने ऐसे बर्ताव किया जैसे उसने देवी को देखा ही न हो।
गौरी का पूरा ध्यान राघव के ऊपर था। देवी भी राघव को देखती है, जिसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। राघव उसे इग्नोर करके देवी के हाथ को पकड़ कर जाने लगा। गौरी की मुस्कुराहट गायब हो गई।
गौरी तुरंत राघव के सामने आकर घबराकर बोली, "क्या हुआ? क्या मैंने कुछ गलत कह दिया है? अगर मैंने कुछ गलत कहा तो मुझे माफ़ कर दो।"
गौरी बहुत कमज़ोर लग रही थी। शिवानी तुरंत उसके पास आती है और राघव को देखकर बोली, "राघव, गौरी काफी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। क्यों न हम बाकी लोगों को जाने दें, फिर हम गाँव चलें। तुम काफी वक़्त से वहाँ नहीं आए हो।"
वे लोग ऐसे बात कर रही थीं जैसे राघव के बहुत करीब हों। निशांत और शूरवीर नाराज़गी से उन लोगों को देख रहे थे। निशांत बोला, "यह लड़कियाँ खुद को समझती क्या हैं? क्या इन्हें दिख नहीं रहा? भाभी रघु भैया के साथ हैं।"
माला की नज़र देवी पर गई। उसने ऊपर से नीचे तक देवी को देखा, फिर मुस्कुराकर राघव से बोली, "क्या यह तुम्हारी भाभी है? पर तुम अपनी भाभी को उठाकर मंदिर के अंदर क्यों ले गए थे?"
राघव गुस्से से पलटकर शूरवीर को देखता है। शूरवीर भागते हुए आया और माला को देखकर बोला, "क्या तुम लोगों के पास कोई काम नहीं है? जाकर अपना काम करो और रघु भैया को परेशान मत करो।"
देवी इंटरेस्ट के साथ तीनों लड़कियों को देखती है, फिर राघव को। राघव को चिढ़े हुए देखकर उसे अच्छा लग रहा था।
राघव उन तीनों लड़कियों को इग्नोर करते हुए देवी के साथ वापस जाने लगता है। ऐसा लग रहा था वह बस यहाँ से जाना चाहता हो। देवी ने भी कुछ नहीं कहा। जब वे कार के पास पहुँचे तो उन्होंने देखा गार्ड्स टायर निकाल रहे थे।
राघव को देखते ही एक गार्ड बोला, "**छोटे ठाकुर, पता नहीं कैसे हमारी कार पंक्चर हो गई है। सिर्फ एक कार नहीं, सारी की सारी कार पंक्चर हो गई हैं। हमारे पास कुछ ही टायर हैं, हम उसे थोड़ी देर में बदल देंगे। मैंने पहले ही मुखिया से बात करके रहने का इंतज़ाम कर दिया है। जैसे ही टायर सही होगा हम आपको बुला लेंगे।" राघव ने देखा मुखिया वहीं पर खड़ा है।
मुखिया जी राघव को देखकर मुस्कुराते हुए बोले, "छोटे ठाकुर, हमारे साथ चलिए। हमने सारे इंतज़ाम कर दिए हैं।"
देवी पलटकर अपने पीछे आ रही तीनों लड़कियों को देखती है।
उनकी आँखों में चमक देखकर देवी धीमी आवाज़ में बोली, "मक्खियाँ।"
जब वे लोग मुखिया के घर पर पहुँचे तो मुखिया जी एक कमरे की तरफ इशारा करके बोले, "छोटे ठाकुर, आप और आपकी पत्नी यहीं रुक सकते हैं। हम थोड़ी देर में खाने का इंतज़ाम कर देंगे।"
राघव केवल सर हिला देता है और देवी को लेकर कमरे की तरफ जाने लगता है। ठीक उसी वक़्त गौरी वहाँ पर आ जाती है।
उसने जब दोनों को एक ही कमरे की तरफ जाते हुए देखा तो वह तुरंत रुक कर बोली, "रुकिए, छोटे ठाकुर, आप यह क्या कर रहे हैं?"
फिर गौरी तुरंत मुखिया जी को देखकर बोली, "पिताजी, आप छोटे ठाकुर और उनकी भाभी को एक ही कमरे में कैसे भेज सकते हैं? मैं अभी दूसरा कमरा तैयार कर देती हूँ वरना वे हमारे पड़ोस में भी रुक सकते हैं।"
मुखिया जी के चेहरे के भाव बदल गए और वह घबराकर राघव को देखने लगे।
मुखिया जी घबराकर बोले, "छोटे ठाकुर..." राघव के धैर्य ने जवाब दे दिया था।
उसने ठंडी आवाज़ में कहा, "जब तक हम यहाँ हैं, हम इस लड़की को अपनी आँखों के सामने नहीं देखना चाहते। अगर इसने दोबारा हमारी दुल्हनिया के बारे में एक शब्द भी कहा तो हम इसे बोलने लायक नहीं छोड़ेंगे।" इतना कहते ही वह गुस्से से देवी को लेकर रूम के अंदर चला गया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया।
गौरी हैरान थी, वहीं मुखिया जी गुस्से में थे। उन्होंने गौरी को एक ज़ोरदार थप्पड़ मारकर कहा, "क्या तुम्हारा दिमाग खराब है? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई छोटे ठाकुर की आँखों में देखकर बात करने की? वह भी इस लहजे में? क्या तुम मरना चाहती हो? दोबारा ऐसी गलती न हो।" इतना कहते ही मुखिया जी चले गए, वहीं गौरी अभी भी शॉक में खड़ी थी।
रूम के अंदर देवी ने देखा एक सिंगल बेड रखा था जो काफी साफ़ सुथरा था। देवी आराम से बैठ जाती है और वह ऊपर से नीचे तक राघव को देख रही थी जो बिना किसी भाव से खड़ा था और उसे ही देख रहा था।
देवी डेविल स्माइल करके बोली, "आपके तो बहुत चाहने वाले हैं। क्यों न आप इन्हीं में से किसी एक को अपनी दुल्हन बना लें? आह!"
राघव एकदम से उसे बेड पर अपने नीचे दबा लेता है और डरावने अंदाज़ में बोला, "अगर हिम्मत है तो फिर से बोलो।"
राघव की साँसें देवी के
चेहरे पर पड़ रही थीं। राघव ने कसके देवी के बाल पकड़े थे इसलिए देवी को दर्द भी हो रहा था। राघव की आँखें लाल थीं जैसे वो अपना आपा खोने वाला हो।
कंटिन्यू….
आगे जानने के लिए बने रहे।




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