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" Khatra"

राघव और देवी दोनों ही मुखिया और मुखिया की पत्नी के साथ बैठकर खाना खा रहे थे।

देवी चुपचाप थी, क्योंकि थोड़ी देर पहले जो कुछ हुआ था, उसके कारण वह थोड़ा अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी।

राघव को जैसे कोई फ़र्क़ ही न पड़ रहा हो। मुखिया जी राघव से बोले, "छोटे ठाकुर, क्या आपको कुछ और चाहिए?"

राघव बिना भाव से बोला, "नहीं, मुखिया जी।"

वह देवी को देखकर बोले, "छोटी ठकुरानी, आप तो कुछ खा ही नहीं रही हैं। क्या खाना अच्छा नहीं है? मैं कुछ और बनवा दूँ?"

"खाना अच्छा नहीं है" यह सुनकर मुखिया की पत्नी के चेहरे पर घबराहट नज़र आने लगती है।

देवी थोड़ा सा रुकती है, मगर फिर धीमी आवाज़ में बोली, "वह... मुझे ज़्यादा भूख नहीं है।" इतना कहते ही वह चुपचाप थोड़ा-थोड़ा खाना खा रही थी।

राघव के होठों पर ठंडी मुस्कुराहट थी, क्योंकि मेज़ (टेबल) के नीचे से वह देवी के साथ छेड़खानी कर रहा था। देवी बस अपने ग़ुस्से को दबा रही थी।

गौरी दूर से ही खड़ी सब कुछ देख रही थी। उसने देख लिया था कि मेज़ के नीचे से राघव बार-बार देवी के साथ किस तरह छेड़खानी कर रहा था।

गौरी कसकर मुट्ठी बंद कर लेती है और दाँत पीसकर ख़ुद से बोली, "नहीं, मुझे जल्दी कुछ करना होगा। छोटे ठाकुर केवल मेरे बन सकते हैं। मुझे इस लड़की को उनकी ज़िंदगी से बाहर निकालना होगा।" इतना कहते ही वह पैर पटकती है और बाहर चली जाती है।

गौरी ने देखा, कुएँ के पास इस वक़्त मुस्कान खड़ी थी, जो पानी भर रही थी।

अचानक उसकी आँखों में एक चमक आ जाती है और वह शैतानी मुस्कान (डेविल स्माइल) करके बोली, "अब देखती हूँ वह लड़की छोटे ठाकुर को कैसे नहीं छोड़ती!" इतना कहते ही वह अपने अंदर की ख़ुशी को दबा नहीं पा रही थी।

इधर खाना खाने के बाद राघव देवी को लेकर जाना चाहता था, मगर मुखिया जी ने उसे देखकर कहा, "छोटे ठाकुर, मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ। अगर आपके पास वक़्त हो तो।"

राघव मना करने वाला था, मगर तभी मुखिया जी जल्दी से बोले, "यह आपकी दादी के बारे में है।"

यह सुनकर राघव केवल सर हिला देता है। उसके बाद देवी को देखते हुए शरारती मुस्कुराहट के साथ बोला, "दुल्हनिया, हमें ज़्यादा याद मत करना। हम बस थोड़ी देर में आते हैं। अच्छी दुल्हनिया की तरह अपने पति का इंतज़ार करो।"

इतना कहते ही वह देवी के सर को थपथपाता है, फिर बिना किसी भाव से मुखिया जी को देखते हुए उनके साथ जाने लगा।

देवी ख़ुद से बोली, "चालबाज़!"

मुखिया जी की पत्नी थाली समेटती है। देवी थोड़ा सा परेशान लग रही थी।

उसके मन में क्या चल रहा था यह पता लगाना थोड़ा मुश्किल था। उसका दम भी घुट रहा था।

देवी तुरंत घर से बाहर निकल जाती है और आसपास देखने लगती है।

कुछ दूरी पर उसे शूरवीर दिखता है। देवी शूरवीर की तरफ़ जाने लगती है। शूरवीर उस वक़्त फ़ोन पर बात कर रहा था।

देवी उसके पीछे खड़ी हो गई, वह कॉल ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही थी, मगर तभी उसकी नज़र कुएँ के पास गई जहाँ पर एक बच्चा खड़ा था।

वह बच्चा गुब्बारे (बैलून) के साथ खेल रहा था। थोड़ी सी भी लापरवाही होने के कारण वह बच्चा कुएँ में गिर सकता था।

देवी आवाज़ देना चाहती थी, मगर उसे लगा अगर उसने आवाज़ लगाई तो बच्चा चौंककर कुएँ में गिर सकता था।

इसलिए वह उस बच्चे की तरफ़ बढ़ने लगती है। गौरी भी उसी तरफ़ जाने लगती है, मगर उसकी नज़र केवल देवी पर थी।

देवी एक झटके से उस बच्चे को पकड़ लेती है और शांत आवाज़ में बोली, "दूसरी तरफ़ खेलो जाकर। यहाँ पर तुम गिर सकते हो।"

वह बच्चा देवी को देखता है। किसी अनजान इंसान को देखकर वह हल्का सा घबरा जाता है और फिर जल्दी से भाग जाता है।

देवी उस बच्चे को देखती है। उसने देखा शूरवीर कॉल काट चुका था। वह उसकी तरफ़ जाती, उससे पहले ही गौरी उसका रास्ता रोक लेती है।

गौरी उसे दुश्मनी भरे भाव से देख रही थी। देवी शांत नज़र से उसे देख रही थी।

देवी जाने की कोशिश करती है, मगर गौरी फिर से उसे रोककर बोली, "बिल्कुल लोमड़ी हो तुम।"

यह सुनते ही देवी के कदम रुक जाते हैं और वह आँखें छोटी करके गौरी को देखने लगी। तो गौरी दाँत पीसकर बोली, "मैं तुम्हें एक मौक़ा देती हूँ, छोटे ठाकुर को छोड़ दो। तुम उनके लायक नहीं हो।"

देवी की आँखों में चमक आ गई। वह हल्की मुस्कुराहट के साथ बोली, "अगर मैं उनके लायक नहीं हूँ, तो क्या तुम उनके लायक हो?"

यह सुनते ही गौरी ग़ुस्से से बोली, "तुम्हें उससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए! छोटे ठाकुर एक देवता की तरह हैं और तुम उनके नौकर बनने के लायक भी नहीं हो। तुम बस उनकी ज़िंदगी में एक दाग हो। बेहतर होगा छोटे ठाकुर को छोड़ दो।"

देवी ऊपर से नीचे तक गौरी को देखती है। गौरी की नज़रें ऐसी थीं जैसे वह देवी को जान से मार देगी।

देवी को यह काफ़ी दिलचस्प लगा। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "एक राज़ बताऊँ?"

इतना कहने के बाद वह अपने बाल को थोड़ा सा झटकती है और गौरी की तरफ़ झुककर घमंड से बोली, "जब कोई मुझे कुछ करने से रोकता है न, तो मुझे वही काम करने में बहुत मज़ा आता है। तुम चाहती हो मैं उस थर्ड क्लास राघव को छोड़ दूँ?"

यह सुनते ही गौरी के तन बदन में आग लग गई और वह ग़ुस्से से बोली, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई छोटे ठाकुर का नाम लेने की! वह हम सबके लिए भगवान जैसे हैं, तुम उनका नाम अपने मुँह से कैसे ले सकती हो?"

देवी को उसकी बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। उसने आगे कहा, "मेरी बात कान खोलकर सुन लो, मैं उसे नहीं छोड़ूँगी। तो तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी?"

देवी जाने लगती है, मगर गौरी उसकी कलाई पकड़कर बोली, "मैंने जितना सोचा था, तुम उससे भी ज़्यादा बेशर्म हो जो छोटे ठाकुर से चिपकी हुई हो। अगर तुम छोटे ठाकुर को नहीं छोड़ोगी तो मुझे कुछ करना पड़ेगा।"

देवी को समझ नहीं आ रहा था ये लड़कियाँ राघव को इतना पसंद क्यों करती हैं।

उसने बिना भाव से कहा, "छोड़ो मेरे हाथ को।"

गौरी पागलों की तरह बोली, "नहीं!"

गौरी की आँखों में एक चमक थी। उसने जानबूझकर देवी को कुएँ के और क़रीब खींच लिया था।

देवी की पीठ कुएँ की तरफ़ थी, इसलिए उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया।

वहीं राघव मुखिया जी से बात करने के बाद अपनी आँखों पर चश्मा लगाता है और धीरे-धीरे घर से बाहर निकलने लगता है।

शूरवीर की नज़र एकदम से देवी और गौरी पर चली जाती है, तो वह आँखें छोटी करके उन्हें देखने लगा।

फिर निशांत से बोला, "यह भाभी जी उस गाँव की छोरी से क्या बात कर रही हैं?"

निशांत आँखें छोटी करके बोला, "यह तो वही लड़की है जो राघव भैया के पीछे पड़ी थी। चलो चलकर देखते हैं।" वे दोनों देवी की तरफ़ बढ़ने लगते हैं।

देवी शांत आवाज़ में बोली, "अपना यह पागलपन अपने माँ-बाप को दिखाओ जाकर। मैं तुम्हारी माँ-बाप नहीं हूँ जो तुम्हारे नख़रे झेलूँ।"

देवी जाना चाहती थी, मगर गौरी बार-बार उसे रोक रही थी, इसलिए उसे भी ग़ुस्सा आ गया था।

ठीक उसी वक़्त गौरी पैर मुड़ने का नाटक करती है और एकदम से देवी के ऊपर गिरने लगी। देवी उसकी इस हरकत से एकदम हैरान (शॉक) हो गई थी।

वह गौरी को पकड़ लेती है, मगर गौरी हल्का सा धक्का देती है। देवी ख़ुद को संभाल नहीं पाती और सीधे कुएँ में गिर जाती है।

शूरवीर और निशांत जिस जगह से आ रहे थे, वहाँ से बिल्कुल नहीं दिख रहा था कि गौरी ने देवी को धक्का दिया है। और राघव की नज़र केवल उसके फ़ोन पर थी, वह अभी-अभी घर से बाहर निकला था।

शूरवीर हैरान होकर चिल्लाया, "भाभी!"

राघव अपनी नज़र फ़ोन से हटा लेता है और शूरवीर को देखता है। उसने शूरवीर की नज़रों का पीछा करते हुए कुएँ की तरफ़ देखा, पर उसे कुछ समझ नहीं आया।

निशांत जल्दी से बोला, "रघु भैया, भाभी कुएँ में गिर गई!"

यह सुनते ही राघव के चेहरे के भाव ठंडे हो गए।

वह बिना सोचे समझे जा

कर कुएँ में कूद जाता है।

शूरवीर और निशांत के साथ-साथ गौरी भी यह देखकर हैरान हो गई।

कंटिन्यू….

आगे जानने के लिए बने रहे

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