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" Evil smile"

राघव के सामने मुखिया दोबारा आ चुके थे क्योंकि उन्होंने सब कुछ पता कर लिया था।

इस वक्त उनकी लाल आँखें गौरी के ऊपर थीं। गौरी डरी हुई बैठी हुई थी। मुखिया जी की पत्नी भी डर के मारे घुटनों के बल बैठी थीं।

मुखिया जी घबराकर बोले, "छोटे ठाकुर, मैं... मैं..."

उनकी बात पूरी होने से पहले ही मुखिया जी की पत्नी जल्दी से डरकर बोली, "छोटे ठाकुर, आपको जो सज़ा देनी है आप मुझे दे सकते हैं, लेकिन मेरी बेटी को छोड़ दीजिए।"

मुखिया जी तुरंत अपनी पत्नी को शांत करते हुए बोले, "चुप हो जाओ!"

फिर वह बहुत ही रिस्पेक्ट के साथ बोले, "छोटे ठाकुर, आपको जो करना है आप कर सकते हैं। आखिरकार इस लड़की ने बदतमीज़ी की है... नहीं, इसने तो गुनाह किया है। इसने छोटी ठकुरानी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की है। मैंने कभी सोचा भी नहीं था मेरी बेटी ऐसा करेगी।"

गौरी जैसे ही यह सुनती है, वह डरकर बोली, "पिताजी, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैंने... मैंने कुछ भी जानबूझकर नहीं किया है!"

यह सुनकर मुखिया जी को गुस्सा आ जाता है और वह ज़ोरदार थप्पड़ अपनी बेटी को मारते हुए बोले, "नालायक! मैंने कभी नहीं सोचा था तुम इस तरह निकलोगी! तुमने छोटी ठकुरानी को मारने की कोशिश की है? क्या तुम जीने से थक गई हो?"

मुखिया जी को चिंता थी राघव उनके वंश को खत्म कर सकता था।

अगर उनके परिवार का नामोनिशान मिट जाता तो यह वह बर्दाश्त न कर पाते, इसलिए अपने दिल पर पत्थर रखते हुए उन्होंने राघव से कहा, "छोटे ठाकुर, मैं अपनी इस नालायक बेटी से सारे रिश्ते तोड़ रहा हूँ। आपको जो करना है उसके साथ करिए।"

इतना कहते ही वह जल्दी से हाथ जोड़ते हैं और आगे बोलते हैं, "लेकिन कृपया हमारे परिवार को छोड़ दीजिए। बाकी सब निर्दोष लोग हैं। हम इस लड़की का साथ बिल्कुल नहीं देंगे। आपको जो करना है आप कर सकते हैं।"

यह सुनते ही राघव मुखिया जी की तरफ देखकर आइब्रो ऊपर करके बोला, "क्या सच में, हम जो चाहें कर सकते हैं?"

मुखिया जी डर के मारे अपना सर नीचे करके बोले, "हाँ, आप जो चाहें कर सकते हैं।" इतना कहते ही वह दाँत पीस लेते हैं।

आखिरकार वह अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, पर उन्हें उम्मीद नहीं थी गौरी ऐसी घटिया हरकत करेगी। अब तो वह बस यही उम्मीद कर रहे थे राघव उनके परिवार को कुछ नुकसान न पहुँचाए।

गौरी तुरंत राघव के पैर को पकड़ने वाली थी, लेकिन निशांत तुरंत उसे रोक देता है और धमकी देकर बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई छोटे ठाकुर को हाथ लगाने की? क्या तुम इसके लायक हो?"

गौरी मन ही मन छोटी ठकुरानी बनना चाहती थी। वह राघव को काफी वक्त से पसंद करती थी, इसलिए जब निशांत ने ऐसी बात बोली तो उसका गुस्सा भड़क उठा।

वह उसे उँगली दिखाकर बोली, "तो क्या वह औरत छोटे ठाकुर के लायक है? उसने ज़रूर एक लालच में आकर शादी की होगी। छोटे ठाकुर, वह औरत बहुत चालाक है। वह आपके लायक बिल्कुल भी नहीं है।"

मुखिया जी को और भी ज़्यादा डर लगने लगा। वह तुरंत गौरी को एक और थप्पड़ मार कर बोले, "नालायक! अपना मुँह बंद रखो! तुम कौन होती हो छोटे ठाकुर को यह सब बताने वाली? हम बस एक नौकर हैं, इसलिए अपनी औकात मत भूलो।"

राघव को यह शोर-शराबा बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। इसके बजाय उसे देवी के साथ रहना ज़्यादा पसंद था, भले ही देवी गुस्सा करे।

वह तुरंत अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है और अपनी बंदूक को अपनी जेब में रखते हुए शूरवीर को इशारा करता है और वहाँ से जाने लगा।

मुखिया जी की हिम्मत नहीं हुई एक शब्द भी बोल दें। शूरवीर गार्ड को देखता है। गार्ड ज़बरदस्ती गौरी को लेकर जाने लगा। गौरी चिल्ला रही थी।

मुखिया जी की पत्नी भी रोते हुए विनती कर रही थी, मगर किसी ने भी उन पर ध्यान नहीं दिया। और राघव जैसे ही रूम में पहुँचता है, उसने देखा पूरा रूम खाली है।

पहले तो उसके चेहरे पर नॉर्मल एक्सप्रेशन थे, मगर जब उसे देवी कहीं नज़र नहीं आई तो उसकी आँखें काफी गहरी और डरावनी हो गईं। उसके अंदर से एक डरावनी आभा निकलने लगी।

राघव तुरंत खिड़की  की तरफ देखता है। वह खिड़की से बाहर देखते हुए अजीब तरह से मुस्कुराया, फिर उसकी नज़र बाहर पैरों के निशान पर पड़ी, क्योंकि बाहर मिट्टी थी, इसलिए निशान साफ नज़र आ रहे थे।

राघव ठंडी हँसी हँसते हुए बोला, "दुल्हनिया, तुम खुद को बहुत चालाक समझती हो। खैर, अगर तुम भागना चाहती हो तो कोई बात नहीं। मैं भी तब तक इंतज़ार करूँगा जब तक तुम थक नहीं जाती।"

राघव आराम से बिस्तर पर बैठ जाता है और दोबारा अपनी बंदूक निकालकर उसके साथ खेलने लगता है। वहीं दूसरी तरफ देवी मौका पाकर भाग चुकी थी।

देवी को पूरा भरोसा था अगर वह फिर से ठाकुर हवेली पहुँच जाती है तो वह बचकर भाग नहीं पाएगी, क्योंकि उस हवेली की सिक्योरिटी काफी अच्छी थी।

देवी पहले ही गाँव के पीछे वाले रास्ते से भाग चुकी थी, पर उसे नहीं पता था कहाँ जाना है। वह बस सड़क ढूँढना चाहती थी ताकि किसी से मिलकर आगे का रास्ता पूछ सके।

देवी ने जल्दी-जल्दी में अपनी सैंडल भी नहीं पहने थे। उसके पैर छिल गए थे। आधे घंटे से वो लगातार भाग रही थी, इसलिए वह काफी थक गई थी।

देवी एक बरगद के पेड़ पर हाथ रखकर खड़ी हो गई। वह काफी ज़्यादा हाँफ रही थी। देवी के बाल अस्त-व्यस्त थे।

देवी इधर-उधर देखती है।

उसके बाद उसने पीछे मुड़कर देखते हुए कहा, "बस वह आदमी मेरे पीछे न आए।

अगर आज मैं भाग नहीं पाई तो शायद फिर कभी नहीं भाग पाऊँगी।" इतना कहते ही वह फिर से भागने लगती है। पहले के मुकाबले उसकी चाल धीमी थी।

आखिरकार काफी मशक्कत के बाद देवी सड़क पर पहुँच जाती है। उसकी आँखों में एक अलग सी चमक थी।

देवी वहाँ पर खड़ी होकर किसी के आने का इंतज़ार करने लगी, मगर तभी उसने परेशान होकर कहा, "लेकिन मेरे पास तो पैसे ही नहीं हैं!"

फिर गुस्से से बोली, "यह सब कुछ उस आदमी के कारण हुआ है। पता नहीं उसे मुझसे क्या चाहिए, पर मैं उसे छोडूंगी नहीं। एक न एक दिन बदला ज़रूर ले लूंगी।" इतना कहते ही उसकी नज़र अपनी कलाई पर पड़ी, जहाँ पर जलने का निशान था।

देवी की आँखों में हल्की नमी आ गई, पर उसके दिल में आग थी।

देवी नफरत से मुट्ठी बंद करते हुए बोली, "सबसे पहले तो उस औरत को अच्छा सबक सिखाना पड़ेगा जिसने मेरे हाथ को जलाने की हिम्मत की थी। उस औरत को क्या लगता है, मैं यह सब कुछ सह लूंगी? बस मुझे सही वक्त और मौका मिल जाए। उसके बाद उस औरत को मैं अच्छा सबक सिखाऊँगी कि आगे से मुझे नुकसान पहुँचाने से पहले हज़ार बार सोचेगी।"

देवी की आँखों में सिर्फ नफ़रत झलक रही थी। सरला जी अगर इस वक्त उसके सामने होतीं तो ज़रूर वह सबक सिखा देता ।  खैर, वह बस ठाकुर परिवार में सबके सामने एक आदर्श बहू होने का अब तक सिर्फ नाटक कर रही थी।

देवी खुद पर ही भरोसा करती है और अपने लिए रास्ता बनाते हुए आगे चलने लगी।

कुछ देर बाद देवी को एक दुकान मिल जाती है जो ज़्यादा बड़ी नहीं थी। देवी की आँखों में चमक आ गई।

वह तुरंत अंदर जाती है। उसने अपने हाथ से बेहद कीमती कड़े निकाले और दुकानदार को देते हुए बोली, "मुझे एक कॉल करने दो।"

दुकानदार भी बेहद लालची था, इसलिए वह तुरंत उन कड़ों को ले लेता है। देवी तुरंत दुकानदार का फ़ोन लेकर किसी को कॉल करती है।

दूसरी तरफ से कॉल रिसीव हो जाती है। देवी थोड़ी दूरी पर चली जाती है। थोड़ी देर उसने बात की, फिर कॉल कट करते ही उसने दुकानदार को फ़ोन देने से पहले उस नंबर को डिलीट कर दिया।

देवी दुकानदार को देखती है जो लालच से उसके कंगन को सहला रहा था। देवी ने शांत आवाज़ में कहा, "मेरे यह कंगन बहुत कीमती हैं। इनकी कीमत लाखों में है। मैंने सिर्फ एक कॉल किया है, तो आपको नहीं लगता आपको मुझे थोड़े पैसे देना चाहिए?"

वह दुकानदार तुरंत अलर्ट होकर बोला, "लेकिन तुमने सिर्फ एक फ़ोन करने के लिए कहा था।"

देवी आँखें छोटी करके बोली, "लेकिन मैं तुमसे लाखों रुपए नहीं माँग रही। 5000, मुझे 5 हज़ार दो।"

दुकानदार को लगा इन कड़ों की कीमत के आगे ₹5000 कुछ नहीं होता, इसलिए उसने आसानी से दे दिए। देवी राहत की साँस लेती है और तुरंत वहाँ से चली जाती है।

ठीक 2 मिनट बाद राघव की कार वहाँ पर रुकती है। राघव ड्राइविंग सीट पर बैठा था।

उसकी आँखों पर चश्मा था, मगर होंठों पर एक शैतानी मुस्कुराहट।

उसने देवी को देख लिया था, जो काफी दूर थी, मगर उसे रोक

ने का कोई इरादा नहीं था।

वह खुद से बोला, "ऐसा लगता है दुल्हनिया अभी तक थकी नहीं है।"

कंटिन्यू…

आगे जानने के लिए बने रहे।

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