देवी बस स्टॉप पहुँच गई थी और काफ़ी थकी हुई लग रही थी। बस स्टॉप पर काफ़ी भीड़ थी।
दो बसें वहाँ से जाने की तैयारी कर रही थीं और एक बस अभी-अभी आई थी।
देवी थोड़ा आगे बढ़ती है, तभी कोई उसके कंधे पर हाथ रखता है। देवी पलट कर देखती है, तो वहाँ पर एक इक्कीस साल की लड़की खड़ी थी जिसने डेनिम जींस और टॉप पहना हुआ था।
उस लड़की के बाल खुले थे और वह काफ़ी खूबसूरत लग रही थी। उस लड़की ने मुँह बनाते हुए देवी को देखकर कहा, "आखिरकार तुम्हें मेरी याद आ ही गई, वरना तो तुम मुझे कभी कॉल भी नहीं करती हो।"
देवी उसकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए बोली, "फालतू की बकवास मत करो, पहले यहाँ से चलो, श्रेया।"
श्रेया जब देवी के चेहरे पर हल्की घबराहट देखती है, तो उसने बोला, "क्या हुआ है?"
देवी तुरंत उसकी कलाई को पकड़ लेती है, फिर जल्दी से एक बस पर चढ़ते हुए बोली, "ज्यादा वक़्त नहीं है, चुपचाप बैठ जाओ और मुझे परेशान मत करना, क्योंकि मैं पहले ही थक गई हूँ।" इतना कहते ही देवी विंडो साइड बैठ जाती है।
श्रेया उसके बगल में बैठ गई थी। देवी ने आँखें बंद कर लीं।
श्रेया उससे कई सवाल करना चाहती थी, मगर जब उसने देखा देवी जवाब नहीं देना चाहती, तो उसने चुप रहना ही ठीक समझा। लगभग दस मिनट में बस वहाँ से निकल जाती है।
लगभग दो घंटे बाद देवी अपनी आँखें खोलती है। उसे काफी अच्छा लग रहा था। उसने विंडो के बाहर का नज़ारा देखा; अब शाम होने लगी थी।
देवी अपना सर पलटकर देखती है, तो श्रेया अपने फ़ोन में गेम खेल रही थी। देवी कुछ सोच कर बोली, "हमारे लिए मुंबई की टिकट बुक कर लो। हम सीधे मुंबई जाएँगे।"
श्रेया हैरान हो गई। वह जल्दी से बोली, "क्या? तुम मुंबई जाओगी?"
देवी सिर हिला देती है। श्रेया अचानक खुश होकर बोली, "मैं कितने वक़्त से तुम्हें मुंबई लेकर जाना चाहती थी, लेकिन तुमने हर बार मना कर दिया था। पता नहीं तुम इस राजस्थान के छोटे से गाँव में क्यों रहना चाहती थी। ख़ैर, अब तुम मुंबई जाना चाहती हो, तो मैं बहुत खुश हूँ। मैं अभी टिकट बुक कर लेती हूँ।" इतना कहते ही वह अपना फ़ोन निकालती है और टिकट बुक करने लगती है।
देवी के मन में काफ़ी कुछ चल रहा था। उसकी आँखों में अजीब से भाव थे।
श्रेया के मन में काफ़ी देर से एक सवाल चल रहा था, मगर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे सवाल करे।
देवी विंडो की तरफ देखते हुए बोली, "जो भी पूछना है बस पूछ लो।"
श्रेया की आँखों में चमक आ गई और वह तुरंत मंगलसूत्र की तरफ इशारा करके बोली, "देबू डार्लिंग, यह तुम्हारे गले में मंगलसूत्र क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि टीवी सीरियल की तरह तुमने किसी से शादी कर ली और अब भागने की प्लानिंग कर रही हो? मैंने तो यह भी देखा है, हीरो ज़ोरदार एंट्री मारते हुए बीच रास्ते में ही हीरोइन को रोक लेता है।"
इतना कहते ही वह हँसने लगती है, वहीं देवी बिना भाव के उसे देखती है फिर दाँत पीसकर बोली, "अपना मुँह बंद रखो।"
श्रेया फिर से सवाल करती है, मगर अब देवी ने कोई जवाब नहीं दिया था। उसके चेहरे को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वह जवाब नहीं देना चाहती है।
अचानक श्रेया को कुछ याद आया और वह एकदम से बोली, "अरे नहीं! तुम्हारे पास तो आईडी कार्ड या कुछ भी नहीं है, इसलिए तुम एयरपोर्ट के अंदर दाख़िल कैसे करोगी?"
देवी के चेहरे के एक्सप्रेशन भी बदल गए। उसे एहसास हुआ उसकी किस्मत कितनी ज़्यादा ख़राब है।
वह अपने सर को सहलाने लगती है। बस धीरे-धीरे जयपुर के मुख्य शहर की तरफ़ बढ़ रही थी।
श्रेया और देवी दोनों ही परेशान थीं।
जब वह लोग जयपुर के मुख्य शहर पहुँच जाते हैं, तब तक थोड़ी रात हो गई थी। दोनों ही बस से उतर गईं। सबसे पहले श्रेया मॉल गई, ताकि देवी के लिए कुछ कपड़े और सैंडल खरीद सके।
श्रेया के पास पहले से ही जयपुर में एक फ़्लैट था।
वह दोनों श्रेया के फ़्लैट में चले जाते हैं। देवी को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह मुसीबत से निकल गई हो।
देवी को पता था श्रेया काफ़ी सवाल करेगी, वह तुरंत अपने कपड़े लेकर एक रूम की तरफ़ चली जाती है।
कुछ देर बाद वह नहाकर साफ़-सुथरे कपड़े पहनकर आखिरकार बिस्तर पर लेट गई और सो गई। श्रेया अभी भी हॉल में बैठी हुई थी।
वह उस रूम की तरफ़ देख रही थी जहाँ देवी थी। उसने खुद से कहा, "मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, जैसे यह कुछ बड़ा छिपा रही है? ख़ैर, जब तक यह खुद नहीं बताती, मुझे पता नहीं चलेगा। मुझे बस इंतज़ार करना चाहिए।"
इतना कहते ही वह भी उठकर अपने रूम की तरफ़ चली जाती है। दोनों ही आराम से सो रही थीं।
अगली सुबह देवी आठ बजे उठती है। उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
देवी काफ़ी खुश थी। वह अंगड़ाई लेते हुए बोली, "आख़िरकार राघव नाम की मुसीबत मेरी ज़िंदगी से निकल गई। एक बार मैं मुंबई पहुँच जाऊँ, उसके बाद यह आदमी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बेवकूफ, बिगड़ैल, अमीर बाप की औलाद! तुम सबको तो मैं छोडूँगी नहीं, ख़ासकर उस बूढ़ी औरत सरला को।"
देवी नहाने के बाद रूम से बाहर चली जाती है। देवी ने एक हॉट पैंट पहना था और ऊपर एक शर्ट पहनी थी जो थोड़ी बड़ी थी। उसने शर्ट का आधा हिस्सा हॉट पैंट में दबा रखा था।

उसके बाल खुले थे और वह काफ़ी सुंदर लग रही थी। देवी आराम से हॉल में बैठ जाती है, फिर गहरी साँस लेकर बोली, "आज़ादी कितनी अच्छी लगती है।"
श्रेया किचन से कॉफ़ी लेकर आती है और एक मग देवी को देते हुए मुँह बनाकर बोली, "तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे तुम्हें कैद करके रखा गया हो, और तुम मुझे सच बताने को तैयार नहीं हो। क्या अब हम बचपन के बेस्ट फ्रेंड नहीं रहे?"
देवी उसकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कुछ सोच कर बोली, "मेरे छोटे अंकल को कुछ मत बताना। जब हम मुंबई पहुँचेंगे, बेहतर होगा तभी मैं उनसे मिलूँ।"
श्रेया डर के मारे बोली, "क्या तुम पागल हो? क्या तुम्हें सच में लगता है मैं उसे खलनायक को कुछ बताऊँगी? भले ही उन्होंने आर्मी छोड़ दी, मगर अभी भी वह बहुत ख़तरनाक हैं, ख़ासकर बचपन में जब वह हमें मारा-पीटा करते थे। वह तो ऐसे इंसान हैं जो हमें रस्सी से बाँध देंगे और ऊपर से नीचे तक हमें गालियों से भर देंगे। मुझे सचमुच बहुत शर्म आएगी। ख़ैर, वह छोड़ो, तुम्हारे मॉम-डैड इस वक़्त लंदन में हैं। अगर उन्हें पता चल गया कि तुम यहाँ किसी और को अपना माँ-बाप मान बैठी हो और एक छोटे से गाँव में रह रही हो, तो तुम्हारी ख़ैर नहीं। मैं बता रही हूँ, मैं तुम्हारी सज़ा अपने सिर नहीं लूँगी और भाग जाऊँगी।"
देवी अपने माता-पिता का ज़िक्र सुनकर भी कोई रिएक्ट नहीं करती, मगर अपने छोटे अंकल के ज़िक्र से वह थोड़ी सी डर गई थी।
श्रेया इस बार सीरियस होकर बोली, "देवी, मुझे सच-सच बताओ, आख़िर तुम एक छोटे से गाँव में क्यों रह रही थी? क्या कुछ ऐसा है जो मुझे नहीं पता? और तुम इतनी भोली तो नहीं हो जितना भोली तुम उस परिवार के साथ बनकर रहती हो। अगर तुम्हारे छोटे चाचा ने तुम्हें ऐसा कमजोर कैरेक्टर करते देख लिया होता न, अपनी बंदूक लेकर तुम्हारे पीछे भाग रहे होते।"
देवी अब थोड़ी घबराई थी। उसने दाँत पीसकर कहा, "सच में, इस बार बहुत बड़ी गड़बड़ हो चुकी है। मुझे बस उम्मीद है इस बारे में छोटे चाचा को पता नहीं चलेगा।"
श्रेया आँखें छोटी करके बोली, "क्या किया है तुमने?"
तभी डोरबेल बजी।
श्रेया आराम से सोफ़े पर लेट कर बोली, "मैं नहीं जाऊँगी, तुम जाकर खोलो। मैंने तुम्हें कॉफ़ी बनाकर दी है।"
देवी शक भरी नज़रों से दरवाज़े को देखकर बोली, "कौन हो सकता है? हम तो कल रात को ही आए हैं।"
श्रेया हाथ दिखा कर बोली, "अरे यार, जाकर खोलो ना। हो सकता है पड़ोसी हो।"
श्रेया की बात सुनकर देवी अपना कॉफ़ी का मग उठाएँ धीरे-धीरे चली जाती है।
उसने जैसे ही दरवाज़ा खोलकर सामने खड़े इंसान को देखा, एकदम से उसकी आँखें बड़ी हो गईं। कॉफ़ी का मग उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
देवी एकदम से दरवाज़ा बंद कर देती है। उसके चेहरे के हाव-भाव बिल्कुल भी अच्छे नहीं थे। श्रेया टेंशन में आकर बोली, "क्या हुआ? कौन है?"
देवी अपनी आँखें बंद कर लेती है और सर को सहलाने लगती है।
देवी ठंडी नज़रों से श्रेया को देखकर बोली, "क्या भागने का कोई दूसरा रास्ता है?"
श्रेया बस उसकी बात सुनकर हैरान हो गई।
कंटिन्यू...
आगे जानने के लिए बने रहे।




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